03HNAT41 हमें धर्म और संस्कृति को आचरण में लाना जरूरी है : डा. मोहन भागवत
-धर्म नहीं तो सृष्टि नहीं,इसलिए उसे पहचान कर उस पर चलने वाले सुखी रहेंगे
-परमार्थ निकेतन के स्वामी चिदानंद मुनि के 72वें जन्म दिवस पर देश के संतों ने दिया आशीर्वाद
ऋषिकेश, 03 जून (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने कहा कि 142 करोड़ लोग भारत की रीढ़ की हड्डी के मनके हैं। हमें धर्म और संस्कृति को आचरण में लाना जरूरी है। हमें अपनेे धर्म को प्रत्यक्ष रूप से आचरण में उतारना होगा। यह बात सरसंघचालक डा. मोहन भागवत ने परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती के 72वें जन्म उत्सव के अवसर पर शनिवार को आश्रम में आयोजित कार्यक्रम में कही।
सरसंघचालक डा. भागवत ने कहा कि हमारी संस्कृति श्रेष्ठ संस्कृति है, परन्तु भारतीय संस्कृति को उत्थान के लिये प्रयत्न करना होगा। सनातन धर्म पर हमारी सृष्टि है, धर्म नहीं तो सृष्टि नहीं, इसलिए उसे पहचान कर उस पर चलने वाले सुखी रहेंगे। उनका कहना था कि आज विश्व भर में पर्यावरण पर चर्चा हो रही है। हमें उसके लिये कार्य करना पड़ रहा है। हमारी भूमि में सब कुछ है। 6 हजार वर्षों से हम खेती कर रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। जो बातें विज्ञान के लिए उपयोगी हैं, वह हमारे वेदों में उपलब्ध हैं। हमारे पास पहले से ही ज्ञान भी है और विज्ञान भी है।
सरसंघचालक डा. भागवत ने कहा कि इसके बावजूद सनातन धर्म अपना काम करता है। सनातन धर्म अपने विधि-विधान के अनुसार अपना कार्य करेगा। उसे पहचानकर हमें उन संस्कारों को स्वीकार कर चलना होगा तो हम सुखी रहेंगे। धर्म को हमारी जरूरत नहीं है, लेकिन हमें धर्म की जरूरत है। उन्होंने कहा कि स्वामी चिदानंद मुनि के जन्मदिन पर कहा कि उनको अपना जन्मदिन मनाने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन यह हमारी जरूरत है कि वह जो कार्य कर रहे हैं, उसे अपने जीवन में हम लेकर आयें।
उन्होंने कहा कि संतों के आचरण में धर्म रहता है, धर्म सर्वत्र कार्य करता है। इस अवसर पर उन्होंने तुकाराम महाराज के संदेशों को सुनाया। संत एकांत में आत्मसाधना और समाज में लोकसाधना करते हैं। जन्मदिवस के अवसर पर हमारे लिये एक संदेश हैं कि हम अपने स्थान पर रहकर ही कुछ करें। हम दीपक की तरह हैं, जब तक तेल और बाती है तब तक तो कम से कम जलते रहें। हमने जीवन चलाने वालों की चिंता करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि धर्मो रक्षति रक्षितः हमें अन्तिम लक्ष्य तक पहुंचना है। यही संकल्प लेकर यहां से जायें।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने जगद्गुरू शंकराचार्य महाराज से लेकर महामंडलेेश्वर स्वामी असंगानन्द महाराज की परम्परा को प्रणाम करते हुए सभी संतों का अभिनन्दन करते हुए कहा कि गंगा के इस पावन तट और हिमालय की पवित्र वादियों से एक आह्वान करने का समय आ गया है। भारत के ऊर्जावान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भारत का मान पूरे विश्व में बढ़ा रहे हैं। उन्हें यह संस्कृति और संस्कार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से मिले हैं, क्योंकि यह व्यक्ति की नहीं वैश्विक संस्था है। उन्होंने कहा कि भारत ही पूरे विश्व को शान्ति का मंत्र दे सकता हैं, क्योंकि भारत एक जमीन का टुकड़ा नहीं बल्कि शान्ति की भूमि है। भारत का मंत्र ही है वसुधैव कुटुम्बकम्। यज्ञ तो बहुत लोग करते हैं, परन्तु उन्होंने अपने जीवन को ही यज्ञ बना दिया है। यहां बात सत्ता की नहीं सत्य की है। समय समय पर सनातन के सूर्य को ढ़कने के लिये बादल आते रहे हैं,लेकिन कोई ढ़क नहीं पाया। हम संकल्प लें की इस मातृभूमि के मान को सदैव बनाये रखेंगे। हम विकास और विरासत को साथ-साथ लेकर चले। स्वामी चिदानंद ने कहा कि यह प्राकट्य महोत्सव नहीं बल्कि पर्यावरण महोत्सव है, इसलिये पर्यावरण का दीप जलाये रखें।
इस अवसर पर जूना पीठाधीश्वर आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानन्द गिरि महाराज ने कहा कि विगत कुछ वर्षों से योग, आयुर्वेद और भारत की विभिन्न विधाओं से पूरा विश्व परिचित हुआ है। पूरे विश्व में तेजी से सकारात्मक रूप से प्रसारित होने वाली संस्कृति भारत की संस्कृति है। स्वास्थ्य, सौन्दर्य, समाधान और आनन्द देने वाली संस्कृति भारत की संस्कृति है। भारत की संस्कृति हमें भय की ओर नहीं बल्कि भाव व स्वभाव की ओर ले जाती है। उन्होंने कहा कि वृक्ष धरा का श्रृंगार है, इसलिये इनका रक्षण करें। प्रकृति की पूजा केवल भारत में देखी जा सकती है। महाराज के पास एक दृष्टि, अध्ययन, विचार, ज्ञान और चिंतन है आप ऐेसे ही भारत का मार्गदर्शन करते रहें। उन्होंने इस अवसर पर सभी को पौधरोपण का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि जब भारत आजाद हुआ था, तब 1328 वृक्ष प्रत्येक भारतीय के हिस्से में थे। अब केवल 7 वृक्ष रह गये हैं। यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है, इसलिये हमारे पूज्य महाराज जी ने यह अलख जगायी है। इस अवसर पर उन्होंने गांवों बचाने का संदेश दिया।
कथाकार संत मुरलीधर महाराज ने कहा कि संसार में दो तरह का जन्म होता है। एक भोगने के लिये और एक उद्धार के लिये। संतों का जन्म मानवता और प्रकृति के उद्धार के लिये होता है। हम सब पूज्य स्वामी जी को पर्यावरण की सेवा कर अपना उपहार प्रदान करें।
आरएसएस के अन्तरराष्ट्रीय संरक्षक दिनेश ने सर्वमंगल की कामना करते हुए कहा कि मैं स्वामी महाराज को उनके युवा अवस्था से जानता हूं। तब भी उनमें यही तन्मयता थी, वहीं तन्मयता आज पूरे विश्व को प्रकाशित कर रही है।
महामंडलेश्वर स्वामी धर्मदेव महाराज ने कहा कि आज महाराज का आर्विभाव दिवस है उन्होंने भारत के कोने-कोने और समुद्र पार वैदिक सनातन संस्कृति को पहुंचाया है। बसंत जिनके खिलने से धन्य हो जाता है वैसे ही हमारे महाराज श्री हैं, जिन्होंने पूरे विश्व को महकाया है। संघर्ष साधना से मानव माथे का चंदन बन जाता है, वैसे ही महाराज श्री आप हम सब के माथे का चंदन हैं। आज संकल्प लें कि हम अपने जीवन का एक दिन अपने गुरु को दें तो इस प्रकृति का और उद्धार होगा।
महामंडलेश्वर स्वामी हरिचेतनानन्द महाराज ने कहा कि भारतीय संस्कृति को पूरे विश्व में पहुंचाने का अद्भुत कार्य किया है। पूज्य संतों की साधुता और सरलता अद्भुत है। संत पूरे विश्व को नवजीवन प्रदान कर रहे हैं। एक समय ऐसा था जब अन्धेरा, उजालों को झल रहा था तब मोहन भागवत ही ने नव क्रान्ति प्रदान की। उन्होंने कहा कि स्वामी ने नदियों में अविरल और निर्मल जल और पौधों के रोपण हेतु अद्भुत कार्य किया है।
डा. साध्वी भगवती सरस्वती ने कहा कि पूज्य संतों का जन्मदिवस नहीं होता बल्कि संत तो ब्रह्मण्ड की सेवा के लिये अवतरित होते हैं। स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज के जीवन का एक ही मूल मंत्र है ‘‘हाँ’’ वे सदैव मानवता, प्रकृति और पर्यावरण की सेवा हेतु तत्पर रहते हैं। हम सभी उनके जीवन से सेवा रूपी दिव्य सूत्रों को आत्मसात करने का संकल्प लें। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने सभी पूज्य संतों और अतिथियों को रुद्राक्ष का पौधा भेंट किया।