मोटे अनाज पैदा करने में बढ़ा मऊ के किसानों का रुझान

12HREG68 मोटे अनाज पैदा करने में बढ़ा मऊ के किसानों का रुझान

मोटा अनाज अर्थात श्री अन्न है गुणों की खान

मऊ 12 अक्टूबर (हि. स) । भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत में लगभग 70 प्रतिशत आबादी खेती पर निर्भर है। कृषि क्षेत्र में आधुनिकीकरण और मशीनीकृत कृषि उपकरण और अधिक उपज वाले बीज आ गए जिसके बाद लोगों का रुझान चावल और गेहूं के उत्पादन के प्रति बढ़ गया। परिणामस्वरूप मोटे अनाज की खपत और खेती दोनों सीमित हो गई। समय ने एक और करवट ली और बदली जलवायु परिस्थितियों के कारण लोगों ने फिर इन अनाजों को उत्पादन करना शुरू किया। मोटे अनाज की फसल में अन्य समान फसल की तुलना में कम जल और कृषि साधनों की जरूरत होती है। हमारे देश में, मोटे अनाज मुख्य रूप से खराब कृषि जलवायु क्षेत्रों, विशेष रूप से देश के वर्षा क्षेत्रों में उगाए जाते हैं। इन फसलों को उच्च तापमान वाले क्षेत्रों में उगाया जाता है और उन्हें शुष्क भूमि फसल कहा जाता है क्योंकि इन्हें 50-100 सेमी वर्षा वाले क्षेत्रों में उगाया जा सकता है। ये फसलें मिट्टी की कमियों के प्रति कम संवेदनशील होती हैं और इन्हें कम जलोढ़ या लोमी मिट्टी में उगाया जा सकता है। इन्हें पानी, उर्वरक और कीटनाशकों की भी न्यूनतम आवश्यकता होती है। मोटे अनाज की खेती कार्बन फुटप्रिंट को कम करने में मदद करती है जो आज एक वैश्विक समस्या है।

क्या होते हैं मोटे अनाज

भारत विश्व में मोटे अनाजों के अग्रणी उत्पादकों में एक है और वैश्विक उत्पादन में भारत का अनुमानित हिस्सा करीब 41 फीसदी है।2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स या मोटा अनाज वर्ष के तौर पर घोषित किया गया है। केंद्र सरकार बढ़ चढ़कर इस अनाज को प्रोत्साहित कर रही है और इसके प्रचार और उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रही है। मोटे अनाज में ज्वार, बाजरा, रागी, कुट्टु, काकुन, चीना, सांवा, कोदो आदि शामिल हैं।पुरानी पीढ़ियों में मोटे अन्न पोषण का अभिन्न अंग थे। हालांकि, पोषक तत्वों से भरपूर इन अन्नों का इस्तेमाल लोगों ने समय के साथ कम कर दिया। इस बात को लेकर के जब जनपद मऊ निवासी प्रगतिशील किसान देवप्रकाश राय से नवभारत टाईम्स की टीम ने बात की तो उन्होंने बताया कि समय चक्र बदलता गया और आधुनिकता के इस दौड़ में इन मोटे अनाजों को भी आधुनिकता की नजर लग गई। उन्होंने बताया कि हमारे समय में सभी लोग मोटे अनाजों का सेवन करते थे जिसके कारण वो स्वस्थ होते थे। लेकिन आज की इस आधुनिकता में लोगों ने इसका उत्पादन बिल्कुल ही बंद कर दिया।