30HREG58 संस्कारों का संवर्धन ही भगवान के अवतार का हेतुः विज्ञानानंद महाराज
हरिद्वार, 30 जून (हि.स.)। सृष्टि की समस्याओं का समाधान और संस्कारों का संवर्धन ही भगवान के अवतार का हेतु है। अन्यथा पूतना, कंस और कालिया नाग का वध करने के लिए वे किसी को भी भेज सकते थे। भगवान श्रीकृष्ण ने भारत की बृजभूमि से मानवता का जो संदेश दिया वह आज भी पूरे विश्व में प्रासंगिक है। उक्त उद्गार श्री गीता विज्ञान आश्रम के परमाध्यक्ष महामंडलेश्वर स्वामी विज्ञानानंद सरस्वती महाराज ने राजा गार्डन के हनुमान मंदिर- हनुमत गौशाला में भगवत वाणी का संचार करते हुए व्यक्त किए।
भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाएं एवं महारास का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि बृज की गोपियां कोई सामान्य स्त्री न होकर स्वर्ग के देवता थे और भगवान भोलेनाथ को भी महारास में सम्मिलित होने के लिए गोपी रूप धारण करना पड़ा था। भगवान की माखन लीला का यथार्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि नंदबाबा के 10,000 गाय थीं, उनके पुत्र को माखन चुराकर खाने की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन गोरस की बिक्री बंद हो और गोकुल का गोरस अन्यत्र न जाए, इसीलिए सांकेतिक तौर पर उन्होंने इस प्रथा को बंद कराया। निराकार के स्थान पर साकार की पूजा का शुभारंभ कराने के लिए ही भगवान ने इंद्र के अभिमान को तोड़ते हुए गोवर्धन पर्वत को उंगली पर उठाकर ब्रजमंडल को इंद्र के प्रकोप से बचाया।
आयोजकों एवं भक्तों ने भगवान को छप्पन भोग लगाकर प्रसाद स्वरूप मिष्ठान वितरित कर श्रोताओं का मन एवं अंतःकरण पवित्र किया।