20HREG351 स्वतंत्रता आंदोलन को हिन्दी पत्रकारिता ने आगे बढ़ाया : प्रो. नंदकिशोर
–अतीत को पत्रकारिता के आईने में देखा जा सकता है : प्रो विनोद मिश्र
–पत्रकारिता राष्ट्रबोध और अखंडता की भी संवाहक : डॉ राजेश गर्ग
प्रयागराज, 20 मई (हि.स.)। हिन्दी पत्रकारिता 200 वर्षों के इतिहास को समेटे है। स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम हिन्दी पत्रकारिता ने ही किया था। पत्रकारिता से साहित्य प्रभावित होता है। समर्थ साहित्य के पीछे राजनीति चलती है। हिन्दी पत्रकारिता यात्रा वृतांत को भी अपने में समेटे हुए है।
यह बातें राजस्थान विश्वविद्यालय के प्रो.नंदकिशोर पाण्डेय ने हिंदुस्तानी एकेडमी में ’हिंदी पत्रकारिता और साहित्य निर्माण’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में कहीं। उन्होंने कहा स्वावलम्बी भारत, स्वाभिमानी भारत, स्वदेशी भारत, अस्पृश्यता का विरोध करने वाला भारत और स्वभाषा के विकास के लिए प्रयत्नशील भारत का निर्माण इसी हिंदी पत्रकारिता के ही माध्यम से हो रहा है। भारत की पत्रकारिता स्वतंत्रता आंदोलन की लौ के साथ- साथ सब प्रकार की सामाजिक कुरीतियों के निराकरण की भी पत्रकारिता है।
कालीकट विश्वविद्यालय केरल के प्रो. प्रमोद कोपव्रत ने कहा कि दक्षिण में भी हिंदी और हिंदी पत्रकारिता की जड़ें मौजूद हैं। 1918 से लेकर आज तक दक्षिण में हिंदी पत्रकारिता उत्तरोत्तर समृद्ध हुई है। 1927 में हिंदी प्रचार सभा द्वारा निकाली गई ’दक्षिण भारत’ पत्रिका हो या फिर बाद की ’भारत वाणी’ और ’केरल भारती’ जैसी पत्रिकाएं हों ये सब अखंड और समर्थ भारत के निर्माण के लिए प्रयत्नशील पत्रकारिता का हिस्सा रहीं हैं। 1921 में तमिलनाडु से निकलने वाली ’स्वयंसेवक’ पत्रिका गांधी की प्रेरणा से हिंदी पत्रकारिता को आयाम दे रही थी। कर्नाटक, केरल हो या तमिलनाडु अथवा आंध्र प्रदेश हो हिंदी पत्रकारिता सब जगह व्यक्ति निर्माण, राष्ट्र निर्माण और समाज निर्माण के काम में अनवरत लगी हुई थी।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. पीयूष रंजन अग्रवाल ने कहा कि विश्वसनीयता, ग्राह्यता, पठनीयता पत्रकारिता की बड़ी विशेषताएं हैं। पत्रकारिता जिस अंडर लाइन करंट से चलती है वह करेंट समाज बोध और राष्ट्रबोध के सिवा और कुछ नहीं हो सकता। हमारे मन और चरित्र का निर्माण समर्थ पत्रकारिता से ही संभव है।
राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक हिंदी विभाग इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डॉ. राजेश कुमार गर्ग ने कहा कि पत्रकारिता केवल समाज निर्माण एवं साहित्य निर्माण ही नहीं करती बल्कि राष्ट्रबोध और अखंडता की भी संवाहक होती है। मर्यादा, माधुरी, हंस, कल्पना, सरस्वती, प्रदीप, बाला बोधिनी, हरिश्चंद्र मैगजीन जैसी पत्रिकाओं ने इस देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। सत्र का संचालन इविवि की डॉ. सुरभि त्रिपाठी ने तथा धन्यवाद ज्ञापन इविवि के डॉ. चितरंजन कुमार ने किया।
द्वितीय तकनीकी सत्र में त्रिपुरा विश्वविद्यालय के प्रो. विनोद कुमार मिश्र ने कहा त्रिपुरा जैसी जगह पर प्रारंभ में हिंदी पत्र और पत्रिकाएं हफ्तों विलम्ब से पहुंचती थीं। फिर भी लोग उनकी प्रतीक्षा करते थे। वर्तमान अतीत के बिना नहीं चलता। अतीत को पत्रकारिता के आईने में देखा जा सकता है। भारत संधि का देश है विग्रह का नहीं और यही संधि भारत की पत्रकारिता की विशेषता है।
राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय के प्रो. सत्यपाल तिवारी ने कहा कि पत्रकारिता व्यापक आयाम है। इसका धरातल और गहराई व्यापक है। परंतु इसके लिए साहित्यिक विवेक अनिवार्य है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डॉ. अमरेंद्र त्रिपाठी ने कहा कि समग्र भारत को एकता के सूत्र में पिरोने में यदि कोई विधा सफल हुई है तो वह हिंदी पत्रकारिता ही है। नेहरू ग्राम भारती की डॉ. ममता मिश्रा ने कहा कि राष्ट्रीय भावना का निर्माण हो या समाज के यथार्थ बोध का प्रकटीकरण पत्रकारिता इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। संचालन इविवि के डॉ.विजय कुमार रविदास और धन्यवाद ज्ञापन डॉ.शिव कुमार यादव ने किया।